मेरे चहेते मित्र

Saturday, March 1, 2014

Terminal

बड़ा सोया , सोया सा था
खुद के सपनों में खोया सा था।

फ्यूचर का एहसास हुआ
जागने का प्रयास हुआ

ऐसा नहीं M.B.B.S. कठिन था
Engineering हमारी मेहनत से भिन्न था।

फिर भी उसको छोड़  चला
अपने सपनो कि ओर चला।

थोड़ा दौड़ा थोड़ा भागा
थोड़ा कर लिया रेस्ट।

दोस्तों वक्त हो चला था
फॉर्म भरा , दिया Entrence Test.

टेस्ट रूम कि कहानी सुनाता हूँ
जुबां से अपनी दिल-ए -हाल बताता हूँ.

अपने जोश को खुद में समावेश किया
बड़े कॉन्फिडेन्स से टेस्ट हॉल में प्रवेश किया।

अंदर जाते ही बहुत भीड़ मिला
उसमे से अपना एक वीर मिला।

मै नहीं जनता वह कौन होगा
फ्रेंड बनेगा या कॉलेज से गौण होगा।

ना जाने कितनो का इंसल्ट हुआ
पर दोस्तों हम सब का रिजल्ट हुआ।

एडमिशन लिया कॉलेज आया
सपनो का प्लेटफार्म और बढ़ाया।

सोचा कुछ ख्याति मिलेगी
सीनियर से फ्रेशेर पार्टी मिलेगी।

सपना सब टूट गया
ख्याति पीछे छूट गया।

जिसने जैसा किया वैसा भरेंगे
हम तो अपना क्लास करेंगे।

बड़े अच्छे-अच्छे  टीचर्स थे
एजुकेशन के नए फीचर्स थे।

खुद को इंट्रोड्यूस किया
प्लानिंग कि नॉलेज प्रोडूस किया।

भूलते सीखते फैलते पंख
इंटरनल में लाते अच्छे अंक

प्रोफेसरों से सीख  कर करने लगें क्लास बंक।

बंक-बंक           क्लास बंद
छोटी थी बात हुआ शशि ससपेंड।

झगड़ा झंझट और जोश था
जिसने सुलह किया वह संतोष था।

इसी तरह साल पूरा बीत गया
फ्रेशेर to सीनियर ओहदा मिला।

हमने भी वही गलती कि
फ्रेशरों कि शुरुआत हुई फिकी।

भूल कर सारे दोष अपने
बना लिए नए दोस्त नए सपने।

 रोज लड़ाई , रोज के झगड़े
हर कमेंट हर रिक्वेस्ट

एक दूजे को करे सजेस्ट
 कौन होगा यहाँ सबसे बेस्ट।
 
कुछ खट्टी सी , कुछ मीठी सी
यादों से भरी एक सीटी सी।

सीटी मार माहौल बनाये
यादों का एक शॉल  बनाये।

इस शॉल को सब ओढ़ेंगे
मर्यादा को न तोड़ेंगे।

तोड़ेंगे दीवारों को
गंदी विचारों को।

विचारों से विचार बने
खुशियों का अचार बने।

इस आचार को खाते चल
अपनी आँख लड़ाते चल
दिल कि बात बताते चल।

जो समझे वो अपने है
बाकी सारे सपने है।

सपनो को भुलाना नहीं
अपनों को रुलाना नहीं।

तो ख़ुशी छोड़ कर जायेंगे
एक इतिहास बनाएंगे।

तो एक इरादा करते है
एक दूजे से वादा करते है।

साथ सदा निभाना है
मंजिल को अपने पाना है।

इसी एहसास को जगाये रख
अपनी प्यास बढ़ाये रख।

अभी और भी है सुनाने को
अपनी बात बताने को।

पर क्षितिज के पास शब्द नहीं
विदाई का नहीं ये वक्त सही।

पर समय को किसने रोका है
जीवन का यही झरोखा है।

बस इसी के साथ विराम करू
आप सब को मै सलाम करू।



Friday, August 9, 2013

क्षितिज का हुँकार

हुँकार     हो     अब,
 ना      धैर्य      धरूँ

हुए       शत्रू       तो,
 मै        बैर       करू

क्रोद्ध     को   कम  ना   होने   दो
शोलों    को   तुम   ना  सोने   दो

चिंगारी   कहीं     भी    हो     यदि
उसको    भड़का   तू     अभी यहीं

किसका   आश      तू     जोहे    है
चुप     क्यूँ     खुद   में   ही खोए है

चल जाग-जाग,   लगा आग-आग
युद्ध  की   तैयार   कर  कुंभ-प्रयाग

चल      बाढ़    बन   के    आते   है
उनको    घर   तक   से    भगाते है

मित्रता   की   न    अब   बात करो
शत्रू  हो,     उपहार लो,    मौत धरो

आकाल   सा    उनका    हाल करो
श्वासों   तक   के  लिए मुहाल करो

भूकम्प   तू    ऐसा    उत्पन्न  कर
थर्राए   वे    खुद   जीवन   से    डर

तुफानो    सा     हाँ       वार    करो 
नामों-निशाँ     तक      उजार धरो

बन    प्रलय    तू  ऐसा विध्वंश ला
ना अंश मिले,    दे मिट्टी में मिला

गर    कोई    तुझे    जो      रोकेगा
सर काट  हवन-कुण्ड में, झोके जा


जो     बागी     देश    को    ऐठें   है
सत्ता      में       जा     के    बठे    है

भारत   माँ       को          नोचे-लुटे
बरे     हर्ष     से     उनके व्यंग छूटे

चल    उनका     व्यंग    बनाते   है
आखे   फोड़       धुल     चटाते    है

शहीदों   की   जिनकों  परवाह नहीं
दिखता   कुर्सी    के     सिवा    नहीं

उठ     युवा      तू    अब   संहार कर
क्षितिज      बोले        हुँकार      कर

अब        किसकी    तुझे   प्रतीक्षा  है
महाकाल    की     भी    यही इच्छा है

मन     का      मोहन    तू  चुप है क्यूँ
आँखे खोल      देख      अपनों का लहू

हर    दिन    आगे      वो      बढ़ते  है
सरजमीं     पे      अपने     चढ़ते   है

एक     बार     तो    तू     साहस    दे
बंधन   को     तोड़    अब   तर्कष  दे

गर    तेरा     अब     इख्तियार  नहीं
और    तुझे    देश    से    प्यार   नहीं

तो    त्याग   दे   शासन   का  तू मोह
देश छोर,    पदग्रहण कर शत्रू  गिरोह

हम      तुझको     भी     दिखला   देंगे
भक्ति    क्या  है      सिखला          देंगे

देखो       बादल      भी       सोती     है
वर्षा       भी      अब     ना    होती   है

फिर      भी       नदियों     में   बाढ़ है
प्रकृति          प्रलय        प्रहार        है

हर     कण     क्रोद्धित   अब  गुस्सा है
फिर     भी     तू    क्यूँ     चुप    सा  है

ए      बादल       तू    अब  गरज-गरज
वर्षा   बन   तू      अब        बरस-बरस

सुनामी       सा        प्रलय          बरपा
क्रोद्ध          अपना        उनको     दिखा

बन        सिंह       समान      दहाड़ कर
अब       शत्रू       का       संहार      कर

कद       बढ़ा       ले   तू    पहाड़     कर
शक्ति     की      अपनी     विस्तार  कर

कुचल     दे       उन         कीड़ों      को
ललकारे     जो      अपने   वीरों     को

क्षितिज      चिल्लाए     पुकार      कर
हुँकार      कर               हुँकार       कर




Saturday, May 18, 2013

गर्मी के मौसम में

गर्मी के मौसम में 
बिजली गई रोशन में 

पसीने की बौछार हुई 
घर में अंधकार  हुई 

दिया  सलाई धुंध लो 
इन्वर्टर का स्विच ऑन करो 

इन्वर्टर  जब फेल हो जाए 
छत पर सारे रेल हो जाए 

 ठंडी हवाओं का मेल हो जाए  
चटाई बिछा अब कोई खेल हो जाए 

अन्ताराक्षरी का प्रोग्राम हो 
गाना सरे आम हो  

जो जीता वही  सिकंदर होगा 
बाकी बैठा बन्दर होगा 

जब हवाए बंद हो जायेंगी 
मच्छरों से सब तंग हो जायेंगे 

तालियों की गर-गराहत होगी 
मच्छरों की शामत होगी 

फिर भी बाज न आएगा 
खून चूस भाग जाएगा 

रक्त दान जब कर देना 
आनबान साब धर देना 

जहाँ भी उसे तुम देखो 
थप्पर से उसको ठोको 

फिर भी जो बच  निकले 
खुद ही तू खुजली करले 

और कोई उपाए नहीं 
बिजली अभी तक आई नहीं 

अब कितना बखान करू 
इस सरकार का गुणगान करू 

बहुत हुआ अब लेट लो 
सब समेत घर में चलो । 





Wednesday, March 27, 2013

सुखी होली



सुबह सुबह जब जागा मै 
फटी कमीज में आधा मै 

मुंह पर चुपरा इन्द्रधनुष 
फिर भी लोगों मै  था खुश 

सोचा जाके साफ करूँ 
नल के पास वॉश  करूँ 

ठंडी ठंडी जल को  ले 
अपने चेहरे पर उड़ेले 

मन ही मन मुस्काने लगा 
दर्पण के निकट जाने लगा 

तभी मुझे मलाल हुआ 
मेरा चेहरा तो लाल हुआ 

पानी में भी घोटाला था 
खौन्ग्रेस  का मन काला था 

ज्यों का त्यों मै सर लिया 
ब्रश पकर रगड़ लिया 

पेस्ट नीम हरी सी थी 
उसमें रंग मिली सी थी 

दांतों से धोकेबाजी हुई 
अगस्ता से  सौदेबाजी हुई 

तभी किचेन से महक उठी 
मालपुआ और फुल्कें छोटी 

मुंह की प्यास बढ़ने लगी 
जीभ उधर को  चढ़ने लगी

तभी गैस ने धोखा  दिया
12  के बदले सिर्फ 9  दिया

इंडक्शन ने जान तो बचाली
पर महंगाई ने हलाल कर डाली

इसे देख प्रियसी मैंने पानी बचाली
और इस बार सुखी होली ही मनाली










Saturday, March 23, 2013

बिहार दिवस


खुश हूँ मै तो आज बस
है किसी का जन्म दिवस 

सारा  शहर सजा रखा है 
दिल को अपने खिला  रखा है 

मेलों सा माहौल है 
 जाने कितने लगे स्टाल है 

हर पसंद का टेस्ट है 
कोई लेता नहीं आज रेस्ट है 

सभी घूम के आयेंगे 
बिहार दिवस मनाएंगे 

मंत्री जी का भाषण होगा 
लेज़र शो प्रदर्शन होगा 

राज्य गीत को गायेंगे 
बिहार गौरव गान सुनायेंगे  

व्यंजन का मेला  सा होगा 
खाने वालों का रेला सा होगा 

एक  छोटा नाटक बनायेंगे 
उसमें औरत को दिखायेंगे 

राजन साजन मिश्र इति 
शास्तरीय संगीत सुनायेंगे 

मन ना भरे जो सुन्ने से पहले 
कत्थक नृत्य तुम देख लेना 

आज के दिन तुम मेरे भाई 
उदास न होना यही बस 

आओ घुम कर आते है 
मानते है बिहार दिवस 

सोनू निगम का गीत होगा 
खूब डांस संगीत होगा 

मुशायेरा के प्रतिभागी  होंगे 
नाशाद औरंगाबादी होंगे 

 मुशायेरों से दिल जो  ना भरे 
तो  हास्य कवी सम्मलेन की और चलें 

हँसते हँसते पेट में बल जो आये 
रूककर थोर व्यंजन खाएं 

लिट्टी हो चोखा 
 किसने है तुमको रोका 

खूब मजे से खायेंगे 
आज बिहार दिवस मनायेगे 





Sunday, January 20, 2013

रेप का महान कुम्भ


काफी दिनों से  मौन था 
कविताओं की दुनियां से गौण था ।

अचानक हस्क्षतेप हुआ 
सुनने में आया की रेप हुआ ।

बात फ़ैल गई चारो ऒर 
सजा दिलाओ यही था शोर। 

आओ सूली चढ़ा देते है 
सरेआम उसे जला देते है ।

बनायें कुछ नया कानून 
हर जुबान पर इसी की  धुन ।

जंगल में आग सी लग गई 
गिडरों की भगदर मच गई ।

सब अपनी  जान बचाते थे 
भेड़-बयान  सुनाते थे ।

पर-संस्कृति पर प्रहार हो 
या अपने चरित्र का उद्धार हो ।

सीमाओं  को ना पार करो 
तालिबानी फरमान गाठ धरो ।

न्याय त्वरित करवाई हो 
बहस नहीं लड़ाई हो ।
                                                
तभी एक ब्रेक हुआ 
इस बार देश का रेप हुआ ।

सर काट के ले गएँ  वो 
दुश्मन देश के थे जो।

मुद्दा अब बदल गया 
हर दिल में इसका दख़ल  गया  ।

न्याय मिले, ना, क्या गम है 
देश के क्रन्तिकारी हम है ।

सारे गिडर सियार हो गएँ 
देखो कितने होशियार हो गएँ ।

विरांगनी करुण पुकार करे 
 वीर के मुख का इन्तेजार करे ।

उसकी भी आखरी चाहत थी 
उनके मुख को देख पाती ।

संभव न था वापस लाना 
सो देते रहे सांत्वना ।

दुःख से वो बेहाल हुई 
घर में ही भूख हड़ताल हुई ।

सियार  काफी डर गए 
इसिलिय  उसके घर गए ।

वही  पुरानी   चाल चली 
रुपये-रोजगार पर  दाल गली ।

हर-पल रेप यहाँ होता है 
ये देश अपना एकलौता है ।

 बड़ा  पवित्र स्थान है ये 
कुम्भ की धरती महान है ये।
                                                                
भ्रदरा  का जहाँ मिलन हुआ              भ्रदरा= (भ्रष्टाचार-दरिदगी-राजनीती)
रेप का कुम्भ वहां उद्गमन हुआ ।

आओ मिलकर रेप करें 
काम तो कुछ नेक करें ।

भ्रष्टाचार की इज्जत लूट लो 
खूंखार  की इज्जत लुट लो ।

राजनीती को हम नग्न करें 
महंगाई का चिर हरन  करें ।

रेप का कुम्भ महान है 
करले तू भी स्नान हे ।













Thursday, November 15, 2012

सामर्थ




मेरे शब्द कही खो  गए  है
शयद जुबां  में हि सो गए है।

ना जाने क्यूं कविता नहीं बनती
मन में क्यूं इच्छा नहीं जगती ।

की लिखू   क्या   आज  मै
बने कोई आवाज लय ।

की कोई कल्पना कर पाता नहीं
नई कोई रचना आता नहीं ।

कविताये  और भी पुराने है मेरे
पर वो भी आधे उकेरे  से है रे ।

मुझे कतई ग्लानि नहीं की
मेरी सामर्थ कम हो गयी ।

या मेरी रचना शक्ति
यद्पी भंग हो गयी ।

परन्तु हैरान अवश्य हूं
स्वयं से कुंठित विवश हूँ ।

की दिया क्यूं ये शक्ति
जब खोनी ही थी ।

इंशान को कवि की
जब ये होनी ही थी ।

फिर भी जोर लगाता हूँ
अपनी कोशिश को आजमाता हूं ।

शायद कुछ बात बने
मेरी सोच हि कविता का रूप ले ।।


Friday, October 12, 2012

कॉलेज की प्रतियेगिता


हर साल की भांति इस साल भी
प्रतियोगी परीक्षाएं शुरू हो गयीं ।

टी . वी  का स्विच आफ हुआ
किताबे   गुरु   हो        गयी ।

दाखिले    को     है सब परेशान
कट- आफ ने ले ली सबकी जान

IIT,    IIM    पहाड़   बन गया
कोचिंग  फी बुखार बान  गया ।

रेगुलर कोर्स   के   तो    लाले है
वोकेशनल ने ही हमें सम्हाले है

इसमें    भी   इंट्रेंस है  बरा रोड़ा
कईयों    का   इसने सर फोड़ा ।

पिताजी  का  शुरू    हो गया कहर
किताबो तले गुजरता है सातो पहर ।

डर से मन कर रहा थर -थर
कईयों ने खाली  देखो जहर ।

जो     निडर      है    वो    आये     है
किताबो में अश्लील मगज़ीन छुपाये है ।

पिताजी को देते है पल-पल धोखा
पिटे है बियर , विष्की या वोडका ।

पढना जरुरी है सो क्लास करने जायेंगे
दूर के ही कॉलेज में एडमिशन करवाएंगे ।

बिना बाइक  दुरी     नहीं घटेगी
बाइक होगी तभी गिर्ल्फ्रेंड पटेगी ।

गिर्ल्फ्रेंड  पटते  ही कॉलेज भूल जाते है
सिनेमा, पार्क,  और रेस्तरां याद आते है ।

तब     तक      पूरा     साल    बीत    जायेगा
पिछले साल की भांति फिर नया साल आएगा ।।




Saturday, July 21, 2012

बरसात आने से पहले


हर      रात    सोने   से    पहले
जब   पूरी   दुनिया   सन्नाटे में
गुम       हो       जाती          है ।

तब मेढको की महफ़िल जमती है ,
और       कोव्वाली        गाती    है ।

बिस्तर           पर           परे - परे
सुकून        का      शोर    सुनते है ,

और     ये         मेढक       अपना
ताना        बाना         बुनते    है ।

शूरु   करते है एक आइटम साँग ,
मनुष्य   सोचते  है   हमेशा रांग ।

आइटम    में   भी    भक्ति     होती   है ,
बारिस को बुलाने की सकती होती है ।

माइकल जैक्सन  और A .R . रहमान भी फेल होता है
मुजिक         का           नया        मेल       होता      है ।

सम्पूर्ण      वादी        ऑडिएंस     बन      जाती    है ,
ठंडी   हवाए   स्पोंसर   करने   जाने कहाँ से आती है ।

स्पोंसर       मिलते    ही  बनती है  टीम भावना ,
मेढको     की    फ़ौज   बन्ने की है , सम्भावना ।

कुछ    गली   में ,     कुछ     नली   में ,
कुछ दीवार की    तली में घाट लगाते है,
डर  से अब सारे पेड़ म्यूजिक  बजाते है ।

और    ये    मेढक    गला फार कर ,
Rock    -    Pop     गाते         है ।

नया म्यूजिक सुनकर सब कायल हो जाते है,
देखो      बदल     भी    घूम-घूम   कर आते है ।

प्रोग्राम      सुनने     को        पब्लिक     मंडराती     है ,
 इसी बिच कुछ बादलों की आपस में टक्कर हो जाती है ।

सिचुयेसन      बहुत    ख़राब   है,   माहौल पूरा गरम ,
बादलों    की   लड़ाई   में   हुई   बहुत धराम -धरम ।

सब    बरसे   सब   पर  ,   हो   गए   सब लत-पत ,
प्रोग्राम   का बनता धर हुआ , मेरा गया जूता फट ।

और       कुछ     खोने     से      पहले ,
 दोस्तों  ज्यादा बारिश होने से पहले ।

,मै    घर     को    जाता     हूँ ,
सड़क       छोर       जाता हूँ ।

वरना  जल जमाव हो जायेगा ,
मेढक      इसमें         नहायेगा
और अपना कवि  डूब जायेगा ।


 


Wednesday, April 25, 2012

निर्दोष सब्जियों का कष्टपूर्ण जीवन


कल रात  के भयंकर दंगे  ने ,जाने
कितने मासूमों  को निगल लिया ।
उनके  अध्   कटे  अंग  सड़क पर
यहाँ - वहां, जहाँ-तहां बिखरे धर।


इन   गुलाम   सब्जियों   की रोज
बोली लगातें कसाई  सामान ग्राहक
उन्हें बेचते खूंखार निर्मम सब्जीवाले ।

वो   टुकुर -  टुकुर  देखती थी परवल
गोभियों   की   भी  थी वहां हलचल
प्राण  के  लाले  थे  वहां   हर-पल ।

देखा था मैंने, बैगन को मुह चमकाते
उसके  करीब  जल्दी  कोई नहीं जातें
कटहल के अध् कटे सर टोकरियों में परें थे
और उनको खरीदने वाले भी ग्राहक बरे थे ।

प्याज देखकर सभी के आखों में पानी आते
सभी अपना बटुआ- पैसा  या नोट मिलातें

गरीब  आम आदमी की भांति,आलुओं को
  32-40 रूपए  पसेरी   का  भाव  मिलता
मिटटी में  सने गरीबों सा घाव मिलता।

वो बेबस देखता   सामने वाले ठेले पर
रखे   अंगूर-  सेव-  संतरे की   ठाठ,
देश के  नेताओं की  जैसी  होती है बात ।

वो टमाटर मुखबरी का करते है काम,
सो उनको गवानी परती है अपनी जान
हर  रोज   इनके  खून  से  भरी  लाशें
सड़क पर सुबह देखने को मिलती है |
ना जाने इसमें उन किसानो की क्या गलती है,

जो बरे नाजों-ख्यालों  से इन्हें पालते है ,
सजा-सजा कर छोटे बड़े बक्सों में डालते है।
कभी सलाद में तो कभी सब्जिओं में ,
तो कभी समोसे की चटनियों में पाए जाते है
और पकडे जाने पर बरी बेशर्मी से खाए जाते है।    

हर रोज इन्हें खरीद लोग घर को ले जाते  है ,
कुछ फ्रिज तो कुछ टोकरियों में जगह पाते है ।
चाकू और करची के बल इनको  नचाते  है ,
हर रोज गरम आग पर इनको चलाते है ।

इनके कटे घाव पर स्वाद -अनुसार नमक डालते है ,
और ना जाने कितने गर्म तेल में इन्हें उबालते  है ।
आखिर कार इन्हें लज़ीज़ , स्वादिस्ट का ,
मेडल-तमगा      देकर     निगल   जाते है ,
और इनाम बीवियों   के हवाले   थमाते है। 








Friday, February 3, 2012

ट्राफिक जाम

जब नींद ही देर से खुलेगी 
तो दोस्तों   देर तो होगी ही 
सुना है   दुर्घटना से    देरी भली 
पर    जिन्दगी    देर    बनजाये 
तो    दुर्घटना    बन    जाती   है 
हर दुर्घटना जाम का कारण होती है ।
 चाहे  सड़क  हो या जिन्दगी
 जाम      तो    लगेगी      ही 
 कभी रास्ते जाम  होते    है 
 तो  कभी ख्वाहिशें रुक जातें है
और  जिन्दगी पेट्रोल  की तरह
अपनी रफ़्तार में खर्च होते जाती  है।
 हम ऐसी   गाड़ी में बैठे सवारी हैं
जिसके ड्राईवर को रोकना
किसी के हाँथ में नहीं है ।
वो अपनी मर्जी से गाड़ी चलाएगा
ना जाने   किन - किन रास्तों पर
जिन्दगी  को  कब -कब ले जाएगा ।
जिन्दगी उसी ड्राइवर के रहमो कर्म पर चलेगा
कभी जाम तो कभी अंधाधुंध रफ़्तार मिलेगा ।
अर्चनो की तरह गढ्ढे मिलेंगे
और अंधे मोड़ मिलेंगे धोके जैसा ।
जिन्दगी को ताख पर रख
कभी ना सोचना ऐसा - वैसा
गर तू चाहता है, जाये इस जाम से निकल
ना हो कभी जिन्दगी में विफल
तो कूदना परेगा इस रफ़्तार भरी गाड़ी  से
और जूझना परेगा इस जाम की बिमारी से ।
बजते  हार्न की तरह चिल्लाने से फायेदा नहीं
सुनते सब है , पर बनते बहरे है सभी ।
रास्ता तुझे अपना  बदलना होगा
आखिर कार पैदल अकेला चलना  होगा ।
तू थक जायेगा, पैदल अकेला चलते - चलते
या मर जायेगा ....................!,
एमबुलंस के मरीज सरीखे जाम से निकलते
अगर डर है तो जीवन अपना यही निर्वाह कर ले
वरना  जा अपने रस्ते तलाश , समय की परवाह कर ले ।
क्योंकि जिन्दगी बार - बार नहीं आयेगी
जाम तो हर बार लग जाएगी ।


  

Saturday, January 7, 2012

सन्नाटा

सन्नाटा क्या होता है 
सिर्फ मन का गूंगा पन
क्योंकि शोर तो सन्नाटे में  भी होता  है 
जिसमें आवाज नहीं आने की 
डर हमें सताती है 
और अगर कोई आवाज कानो तक 
पहुचे उसकी इन्तेजार में ही सहम जातें है
पर कोई भी लब्ज़  हमें सुनाई नहीं देती है 
तेज बारिश में ,सुनसान सड़क पर 
किसी के ना होने पर 
हमें सन्नाटा सा लगता है 
और भरी महफ़िल में 
किसी पहचान के बिना  हम  
सन्नाटा महसूस करते है 
सर्द हवाओं में भी हम 
सूरज के छुपने पर 
सन्नाटा सा पातें है 
और कड़ी  धुप में 
जलता बदन सन्नाटा महसूस करता है 
मै कवी हूँ और अर्थ से परे लिखना मेरी आदत है 
इसलिए सन्नाटे को शोर का 
रिश्तेदार जनता हूँ 
जो की शोर से कहीं ज्यादा 
प्रभावशाली है 
शोर तो सिर्फ बहार से विचलित करता है 
पर ये सन्नाटा उंदर अन्तः मन को भी झकझोर देता है 
और मै इसी सन्नाटे को 
अपना दोस्त बना चूका हूँ 
जो की मेरे अन्तः मन को रोज  झकझोरता है 
और रोज मै डरा डरा सा खुद को पता हूँ 



Friday, January 6, 2012

अल्फाज़ मेरे

मै बहुत ही नीच किस्म का कवी हूँ |
कभी भी अच्छे स्वर उचारित अथवा प्रकाशित करने की छमता नहीं है मुझमें ,
हमेसा ओछी शब्दों के पीछे भागता रहा हूँ |
जहाँ भी जाता हूँ ये शब्द मेरे साथ रहें  है, 
और सहारा के नाम पे इसने मेरा शोषण किया है| 
हर बार सोचता हूँ मेरे शब्दों में वो जादू क्यों नहीं है,
 जो दुसरे सुनकर मेरी ओर खिचे चले आते न  हैं |
क्यों मेरा एक अलग अंदाज  नहीं है,
 जो मेरे आलावा सभी के पास है| 
कोई कन्नड़ जनता है तो कोई बंगाली ,
पर अपने जुबान की पेटी तो है बिलकुल खली| 
मैं अपनी भाषा तक  भी नहीं जनता हूँ,
और शैली कहाँ से लाऊं मैं ,
मुझे क्या पता कौन सी बात किसको बुरी लगे गी 
मैंने तो सिर्फ बोलना ही सिखा है 
वो भी इसी समाज से जो ना जाने कैसे इतनी अच्छी बोल लेती है |
भीड़ में कोई मेरी क्यों सुनता नही है 
और अकेले मै किस्से बातें करूँ |
में तो भीड़ में भी तनहा सा हूँ 
और अकेले में ना जाने किस महफ़िल से बाते करता हूँ |
ये मेरे अल्फाज़ को भी नहीं पता है 
की मेरा अल्फाज़ क्या है |
 




Thursday, November 17, 2011

रोजगार




हर रात बिस्तर से आस लगता हूँ
कि कल सवेरा ना हो
और मैं ता उम्र या इसके बाद भी
गहरी नींद में सो जाऊं
तो फिक्र ही न होगी मेरे आने वाले वर्तमान कि
और नाही चिंता सताती मेरी शेष बचे अभिमान की
पर यह संभव तो है  नहीं
 इसलिए सुबह होने से पहले नींद खुल जाती है
और रोजगार की बात याद दिलाती है
पर ये मन आलस  बेबस
फिर सो जाता है और पुनः
झूठे  सपनो में खो जाता है ....
 जैसे गरीबों के सपने भी बहुत होतें है
थोरे हँसते है तो कुछ रोतें है
आस में साड़ी जिन्दगी जोहते हैं 
और तबतक सुबह हो जाती है 
बीवी उठाती है, और चिल्लाती है 
की आज काम पर नहीं जाना 
घर में आयेगा कैसे अनाज का दाना ,
और छोटी सी दिवार पर 
लटकी  घडी  की बरी सी सुइयां मुझे 
बार -बार याद दिलाती है
की बेटे उठ जा, नहीं तो  तेरी नौकरी जाती है 
क्या चाय क्या नाश्ता चलो पकरो ऑफिस का रास्ता 
बॉस देते है हमको ना जाने किस किस का वास्ता 
और इशारे से दिखाते है हर -बार बाहर का रास्ता 
वहाँ  भी सुकून की कुर्सी नहीं है 
जो मैंने काम किया था क्या वो सही है? 
इन्ही सब बातो से मैं जाता हूँ हार 
यही है मेरा जीवन, मेरा रोजगार  


Sunday, November 6, 2011

तलाश


जब भी होती हो आस पास 
तुझे देखने की रहती है प्यास 
नज़रें सख्त चट्टान साथ 
करती है दीदार साँस दर साँस
पलकों का पीछा करते गीरे जैसे आकाश
और उस अँधेरे में ख्याल है तेरा खास 
और उठे तो खोले खजाने का कपाट...
 जिससे बढ़ जाती है फिर मेरी दीदार की प्यास 
खज़ाना देख लालच किसे ना होता  
मैं तो बस अदना इंसान हूँ छोटा 
सिर्फ खुद से बेबस ख़जाना देखता हूँ 
और वो खुद  मेरे पास आए  यही सोचता हूँ  
पर सोचने से पूरी नहीं होती है आस 
सिर्फ इंतजार ही है शेष मेरे पास 
इंतजार भी इंतजार कर थक जाएगी 
तब खुद का प्रयास ही रंग लाएगी 
वही मेरी तलाश कहलाएगी

Sunday, October 9, 2011

बिहार के ज़ज्बात


वो जंगलों के नाम से
था कभी मशहूर क्यूँ,?
हाँ शेर तो थे कई 
पर इतना भी गुरुर क्यूँ,?
सीखे थे सब पथिक
यहीं से चलना दूर क्यूँ?
जो ज्ञान कहीं नहीं मिली 
यहीं मिला हुजुर क्यूँ?
हुकुमत-ऐ-हिंदुस्तान 
तेरे रजा-इन्द्र यहीं के थे|
जय घोष जय प्रकाश के
फूल भी यहीं खिले |
वो नीली गायों के लिए 
दौड़ कर यहीं चलें,
स्मरण कथन की बात
वो सर्व प्रथम यहीं चलें|
आन्दोलनों को ले चले,
क्रांति की लहू भरे|
जग देख ना सका
किसे किरकिरी सी लगी,
ना जाने किस दौर में
इसे किसकी नज़र लगी|
और धुल सी आंधियां
भी तेज़ चलने लगी ,
उस पर न मिला कोई साथ ,
सब दूर होने लगें 
मन पर बसी थी ललक 
पर ख़त्म थी इसकी चमक|
और अँधेरी यह राह थी 
कईयों की इसमें आह थी 
काल राह  में जो भी पथिक
चलें सर्वस्व जान कर,
कुछ तो सहम गएँ 
और कुछ क्रोध में अहम् गएँ,
रक्त अपना बहता देख
वो लहू के प्यासे बन गएँ |
शुरू हो गयी देखो
यहाँ भी रण की होलियाँ,
और दूर से देख कर 
वो देने लगे हमें गलियां |
पहले तो बाग़  फूल से था भरा ,
देखो बन गयी है रक्त की घरा
ये तपस्वी जन्म भूमि 
तू देख चुप है क्यूँ पड़ा
युहीं पहर-दर-पहर 
साल भी बीतता  गया 
जो रक्त का बाग़ था
वो किचर में बदल गया 
और गंध दे रही थी 
यहाँ की मिटटी बुरी 
उस पर उपज परे
यहाँ नक्सली बरी 
जो भी उम्मीद थी
वो सारे  अब डर  गयी 
पर जो बोलना चाहा 
उसके  घर बम पर गयी 
बेटियों की हयात 
खुले में लुटने लगें 
माँ बिधवा देख ,
अश्रु धार बहने लगे 
निः शब्द मुख खोल कर 
जब बोलना जो चाहा
तब ज्ञात हमें ये हुआ
की शिक्षा तो  विरल हुई
जो सबने सिखा उसमें
हमने बरी देरी की 
बस एक ही रास्ता था
हमें मजदूरी की 
राज्य जैसे सारे
इसी के फ़िराक में परे 
अपने कारखानों में 
बिहारी मजदुर ही भरें 
जो आग जल परी थी 
पेट की वो ना बुझी 
मजदूरी के आलावा 
कोई दूसरा रास्ता ना सूझी 
निकल परे अपने 
जिगर के टुकड़े घर छोड़  कर 
ये देव देखना इन्हें 
करता हूँ प्रणाम हाथ जोड़कर 
बलिष्ठ था ये बदन 
पर अवशाद ग्रस्त था ये मन 
क्या कमा  पाउँगा धन 
बसर होगा कैसे ये जीवन 
दो लाल पूत भी तो हैं 
उन्हें दूंगा शिक्षा गहन 
ये चेतना लिए
निकल परा ये बिहारी मन 
रेल की धार चलें 
बिहारी हजार चलें 
ढूंढने रोजगार चलें ,
घर से बार -बार चलें 
नयी थी वेश 
नया प्रदेश 
नया नया था समावेश 
दुत्कारियां ,
गालियाँ, 
मजाक की वो तालिया
कर के सहन 
रहन सहन 
हम सब ने अपनालिया 
वे देखते थे आज कल
हम थे हमेशा अटल 
धन खूब बटोरा लुट के
बदनामी हुई थी प्रबल 
इसी से लहू बबल गया 
हर बिहारी संभल  गया 
अब फ़िक्र थी मान की 
स्मिता और अभिमान की 
सवालों की बौछाड़ हुई 
आखिर हमारी क्यूँ हार हुई 
खुद से सवाल कर उठे ,
हम बिहारी  क्यूँ डर उठे 
नव जागरण की बात हो 
अब दिन हो न काली रात हो 
नव चेतना हम में जगा 
दुराचारियों को अब भगा 
सह लिया इस मार को 
अब हटाओ इस सरकार को 
जिसे कुछ ना ख्याल है 
अपने प्रदेश का क्या हाल है 
जनता का यह रोष था
सरकार को न होश था 
बस स्वयं में ही थे मग्न
जन को लूटे सब मंत्रीगण
यह देख आग सी लगी 
नेता छवि दाग सी लगी 
युवा मंच का था आवाहन 
जन शक्तियों का कर गहन 
कर ख़त्म दबंग भ्रष्टाचार 
ला अब यहाँ नयी सरकार 
नव क्रांति की बात हो 
सुख शांति की बात हो 
जिस पर सभी की आस हो 
अब हमारा भी विकाश हो |

Monday, October 3, 2011

मीठा पुर का पुल और पटना

आज पटना शहर थोरी उचीं लग रही थी 
क्योंकी उसमे एक नई पुल जुट गयी थी 
नए रास्तो का अनुभव बड़ा अजीब था 
क्योंकि कुछ आमिर था तो कुछ गरीब था 
जिनको हमने  अक्सर सर उठा के देखा था
वे आज छोटी, बौनी  और गन्दा सा था 
कौन सी रेल अब किधर को जाएगी 
हमें अब मालुम पड़ जाएगी............
pearl  की टूटी दीवारों से उसकी नाम 
आज भी मोतिओं सी चमक रही थी 
आज उचाई से मुझे वो भी दिख रही थी
पर उसके पीछे का बरसो पुराना जमीं रो रहा था
सायद वोह बुढा हो गया था ..........................
 और उस बूढी जमीं पर  चंद्रलोक का सपना अब भी  सो रहा था 
लगता है  पुल वो मीठापुर  वाला यही सोच रहा था  
और मन ही मन उन करकट  की दुकानों  को 
अपनी ऊंचाई का अहसास करा रहा था 
की उठो तुम भी मेरी तरह सुन्दरता और ऊँचाइयों को छु लो |

Saturday, July 30, 2011

दो गिलहरी

मेरे कॉलेज के प्रांगन  में
दो गिलहरी थे मग्न से  I 
कभी पेड़ पर कभी दीवारों के ऊपर चढ़ते दन से I
कभी खिडकियों  से झाका  करते 
क्या शिक्षक पढ़ाते मन से I 
कबी कूद कर जामुन के पेड़ो पर जाते सन से 
झकझोरे डाली को ऐसे हो नई योवन से 
कभी दौर कर वर्ग में जाते 
कभी खाल्ली को उठाते 
कभी घुर कर देखा करते क्या बच्चे पढ़ते लगन से 
मेरे कॉलेज के प्रांगन में 
दो गिलहरी थे मगन से I

Thursday, July 21, 2011

बुख़ार

आज मेरा मन थका- थका सा लाचार है 
शायद मुझे थोरा बुख़ार है 
दुसरे का बोझ उठाना तो दूर 
अपना कन्धा ही भार है  
आंखे देखने को बार बार खोलता हूँ मैं 
पर ना जाने कैसी इसमें खुमार है  
चाहता तो हूँ दौर कर दुनिया घूम लूं 
पर अपनी टांगे बेबस बेकार है 
मन की बात तो बताना चाहता हूँ 
ना जाने इसपर  कैसा भार है 
पूरी दुनिया को जोड़ने की ख़ाहिश है 
पर अपना हीं बदन  टूटकर बेज़ार है





Wednesday, July 6, 2011

उसकी मांग

आज मेरे खून का जवाब माँगा गया 
उसके हर बूंद का हिसाब माँगा गया 
जो भी मिला था जीने के  लिए  
उसकी कहानियों का किताब माँगा गया 
 परत दर  परत जोड़कर जिन्दा हूँ 
आज उसके भी फटे जुराब माँगा गया 
माना की तन ढकने को कपडे  दिए थे 
पर आज वो सारे कपडे  ख़राब माँगा गया 
जब भी रोता था भूख से तड़प कर 
तब तब मुझसे थाली का आकार माँगा गया 
जब भी नींद आती थी मुझको 
तब तब सोने का अधिकार माँगा गया 
चलते चलते जब भी थक कर हार जाता था 
मुझसे दौड़ने का व्यव्हार माँगा गया 
देखता था ढेर सारे सपने हर रोज़ 
उनसे नाता तोड़ने का आधार माँगा गया 




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