Wednesday, July 6, 2011

उसकी मांग

आज मेरे खून का जवाब माँगा गया 
उसके हर बूंद का हिसाब माँगा गया 
जो भी मिला था जीने के  लिए  
उसकी कहानियों का किताब माँगा गया 
 परत दर  परत जोड़कर जिन्दा हूँ 
आज उसके भी फटे जुराब माँगा गया 
माना की तन ढकने को कपडे  दिए थे 
पर आज वो सारे कपडे  ख़राब माँगा गया 
जब भी रोता था भूख से तड़प कर 
तब तब मुझसे थाली का आकार माँगा गया 
जब भी नींद आती थी मुझको 
तब तब सोने का अधिकार माँगा गया 
चलते चलते जब भी थक कर हार जाता था 
मुझसे दौड़ने का व्यव्हार माँगा गया 
देखता था ढेर सारे सपने हर रोज़ 
उनसे नाता तोड़ने का आधार माँगा गया 




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