Thursday, November 15, 2012

सामर्थ




मेरे शब्द कही खो  गए  है
शयद जुबां  में हि सो गए है।

ना जाने क्यूं कविता नहीं बनती
मन में क्यूं इच्छा नहीं जगती ।

की लिखू   क्या   आज  मै
बने कोई आवाज लय ।

की कोई कल्पना कर पाता नहीं
नई कोई रचना आता नहीं ।

कविताये  और भी पुराने है मेरे
पर वो भी आधे उकेरे  से है रे ।

मुझे कतई ग्लानि नहीं की
मेरी सामर्थ कम हो गयी ।

या मेरी रचना शक्ति
यद्पी भंग हो गयी ।

परन्तु हैरान अवश्य हूं
स्वयं से कुंठित विवश हूँ ।

की दिया क्यूं ये शक्ति
जब खोनी ही थी ।

इंशान को कवि की
जब ये होनी ही थी ।

फिर भी जोर लगाता हूँ
अपनी कोशिश को आजमाता हूं ।

शायद कुछ बात बने
मेरी सोच हि कविता का रूप ले ।।